मंगल दोष
मंगल का भाव 1, 2, 4, 7, 8 या 12 में होना — लग्न से और चंद्रमा से, दोनों गिनतियाँ (पूरा पाठ दोनों बताता है)। मंगल ताप, गति और आत्म-बल है; दांपत्य से जुड़े भावों में परंपरा इसे विवाह-जीवन में आई तीव्रता और घर्षण के रूप में पढ़ती है। मिलान का सबसे डराया गया शब्द यही है — और जो शास्त्र इसे परिभाषित करते हैं, वही उसी साँस में इसके परिहार भी।
शास्त्रीय परिहार
- दोनों साथी मांगलिक हों: दो मंगल-चिह्नित कुंडलियाँ एक-दूसरे को संतुलित करती हैं — यही पहला शास्त्रीय नियम है। तीव्रता साझा और समझी हुई होती है, किसी एक पर पड़ी हुई नहीं।
- मंगल अपनी राशि (मेष या वृश्चिक) में हो: स्वगृही मंगल घर्षण नहीं, अनुशासन और साहस देता है — दोष शास्त्रतः निष्फल।
- मंगल उच्च (मकर) में हो: उसका बल रचनात्मक हो जाता है — शास्त्रतः दोष नहीं।
- गुरु मंगल के साथ एक राशि में हों: महाशुभ की संगति शास्त्रीय परिहार है — ज्ञान ताप को साधता है।
- गुरु की दृष्टि मंगल पर हो (5वीं, 7वीं या 9वीं पूर्ण-राशि दृष्टि): बृहस्पति की दृष्टि दोष को शांत करती मानी गई है।
- दूसरे साथी की कुंडली में शनि (समकक्ष पापग्रह) उन्हीं भावों में हो: कुंडलियाँ एक-दूसरे को तौल लेती हैं — यह शास्त्रीय संतुलन-नियम है।
पूरा मंगल-पाठ हमेशा बताता है: दोष किस संदर्भ से बनता है (लग्न, चंद्र, या दोनों) और कौन-से परिहार लागू हैं — गिनाए नहीं, परखे हुए। 'मांगलिक' कुंडली पढ़ने की शुरुआत है, किसी व्यक्ति पर चिपका ठप्पा कभी नहीं; कोई शास्त्र किसी को अविवाह-योग्य नहीं बनाता।
Mangal dosha traditionParāśari tradition